विंध्य वैभव: रहस्यों का महा-अनावरण और मंगल-समापन
शब्दों के इस चलचित्र का अंतिम और सर्वाधिक ज्ञानवर्धक खंड अब आपके समक्ष अपनी पूर्ण आध्यात्मिक और वैज्ञानिक प्रखरता के साथ उद्घाटित हो रहा है। यहाँ हम केवल भूगोल की यात्रा नहीं कर रहे, बल्कि उस परब्रह्म की अद्वितीय संरचना के महागार में एक ऐसी चिरकालीन डुबकी लगा रहे हैं, जहाँ तर्क की सीमा समाप्त होती है और साक्षात् बोध प्रारंभ होता है। चित्रकूट की इन कन्दराओं में विज्ञान के वे गूढ़ रहस्य छिपे हैं, जिन्हें आज की दुनिया 'आधुनिक खोज' मानती है, जबकि हमारे पूर्वजों ने इन्हें हज़ारों वर्ष पूर्व ही अपनी साधना से सिद्ध कर दिया था। आइए, इस महा-यात्रा के अंतिम प्रसंग में स्वयं को विलीन करें।
अध्याय ९: सती अनुसूया और गुप्त गोदावरी – ज्ञान का महासागर
कामदगिरि की पावन परिक्रमा के पश्चात, हमारी बसें चित्रकूट के सघन वनाच्छादित क्षेत्रों की ओर मुड़ीं। मार्ग के दोनों ओर खड़े सागौन और महुए के वृक्ष ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो ऋषि-मुनियों की कोई टोली मौन तपस्या में लीन होकर हमारे इस 'ज्ञान-काफिले' का स्वागत कर रही हो।
सती अनुसूया आश्रम: यहाँ की नीरव शांति और पक्षियों का कलरव मन को असीम तृप्ति दे रहा था। श्री एस.बी. सिंह सर (जीव विज्ञान) ने यहाँ छात्रों को विंध्य की दुर्लभ जड़ी-बूटियों के बारे में विस्तार से समझाया।
गुप्त गोदावरी: भू-विज्ञान और अध्यात्म का सजीव संवाद
प्रखर संवाद: विज्ञान बनाम साधना
गुफा के भीतर शीतल जल के बीच चलते हुए एक छात्र ने पूछा— "गुरु जी, क्या ये गुफाएं केवल प्राकृतिक घटना हैं या इनके पीछे कोई दैवीय विधान है?"
आचार्य आशीष मिश्र ने एक प्रखर उत्तर दिया— "वत्स, जिसे तुम प्राकृतिक घटना कहते हो, वह ईश्वर की 'गणितीय संरचना' है। और जिसे तुम दैवीय विधान कहते हो, वह उच्च स्तर का 'विज्ञान' है। हमारे ऋषियों ने प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि कन्दराओं में बैठकर सृष्टि के सूत्रों को डिकोड किया था। आज की दुनिया जिसे 'खोज' मानती है, हमारे लिए वह 'साक्षात् सत्य' था।"
भारतीय विज्ञान के १० अमर सूत्र
१. गुरुत्वाकर्षण (भास्कराचार्य): “आकृष्टशक्तिश्च मही तया यत् स्वस्थं गुरु स्वाभिमुखं स्वशक्त्या। आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे॥”
२. प्रकाश की गति (ऋग्वेद): “योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने। एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥”
३. पौधों में जीवन (महाभारत): “सुखदुःखयोश्च ग्रहणात् छिन्नस्य च विरोहणात्। जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते॥”
४. शून्य और अनंत (उपनिषद): “ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”
५. सौरमंडल केंद्र (ऋग्वेद): “यस्मिन्त्सूर्य अर्पिताः सप्त लोकाः। सूर्य केंद्र में है और अन्य लोक उसके आकर्षण में बंधे हैं।”
६. समय की सूक्ष्मता (सूर्य सिद्धांत): “लोकानामन्तकृत्कालोऽन्यः कलनात्मकः। स द्विधा स्थूलसूक्ष्मत्वान्मुहूर्ताद्यैश्च मासकैः॥”
७. पाइथागोरस (शुल्ब सूत्र): “दीर्घचतुरश्रस्याक्ष्णया रज्जु: पार्श्वमानी तिर्यङ्मानी च। यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति॥”
८. परमाणु (वैशेषिक दर्शन): “जालान्तरगते भानौ यत् सूक्ष्मं दृश्यते रजः। तस्य षष्ठतमो भागः परमाणुः स उच्यते॥”
९. भूगोल (वराहमिहिर): “पञ्चमहाभूतकयः तारागणपञ्जरे मही गोलः। खेऽयस्कान्तेन लोहो यथावस्थितो वृत्तः॥”
१०. जल चक्र (बृहत्संहिता): “सूर्यरश्मिभिरुत्क्षिप्तं वायुना च सुसंभृतम्। नभसि विपरिवृत्तं जलं वर्षति चाम्बुदः॥”
अध्याय १०: स्फटिक शिला और जानकी कुंड – स्मृतियों का कोलाज
स्फटिक शिला वह स्थान है जहाँ एक विशाल पत्थर पर प्रभु राम और माता सीता बैठकर प्रकृति की सुंदरता निहारा करते थे। छात्रों ने वहाँ अंकित विशाल पदचिह्नों को देखा। पास ही 'जानकी कुंड' है, जहाँ का जल इतना पारदर्शी है कि तलहटी के पत्थर भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। श्री नरेन्द्र त्रिपाठी सर ने यहाँ 'प्रकाश के अपवर्तन' (Refraction of Light) का उदाहरण देते हुए जल की शुद्धता का वैज्ञानिक विवेचन किया।
अध्याय ११: वापसी और स्मृतियों का संचयन – 'शुक्र' का अभिनंदन
शुक्र तारे की दिव्य चमक
२६ दिसंबर २०२५ की भोर। प्रातः ठीक ५:०० बजे, जब बस सीधी जिले की सीमा में प्रवेश कर रही थी, तब प्राचार्य श्री डी.पी. सिंह सर ने खिड़की की ओर इशारा किया। आकाश में 'शुक्र' तारा अपनी पूरी चमक के साथ उदित था। आचार्य जी ने बताया कि कैसे प्राचीन काल में नाविक इसी की स्थिति से दिशा और समय की गणना करते थे।
अध्याय १२: उपसंहार – कृतज्ञता और विदाई
कृतज्ञता एवं आभार
इस महान 'ज्ञान-यज्ञ' की सफलता के आधार-स्तंभ वे कर्मठ शिक्षक एवं सहयोगी हैं, जिन्होंने कदम-कदम पर छात्रों का मार्गदर्शन किया। हम हृदय से आभारी हैं:
प्राचार्य का पाथेय: श्री डी.पी. सिंह
"प्रिय विद्यार्थियों, यह यात्रा केवल भूगोल देखने के लिए नहीं थी, बल्कि आपके चरित्र निर्माण की एक कार्यशाला थी। चित्रकूट की इस पवित्र माटी ने आपको जो अनुशासन और संस्कार दिए हैं, उन्हें जीवन भर अपने आचरण में उतारें। शिक्षा का असली उद्देश्य केवल डिग्रियां पाना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति के प्रति गर्व का अनुभव करना है। विंध्य की इस धरा पर आप भविष्य के कर्णधार हैं। जय हिंद!"
महा-स्मृति वीथिका
॥ शुभं भवतु ॥



















































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